वह केवल एक नाम नहीं थे,
एक ऐसा विचार थे
जिसने समय के अँधेरे में
सत्य का दीप जलाया।
न हाथ में शस्त्र था,
न सत्ता का अभिमान,
फिर भी उनके शांत कदमों ने
एक साम्राज्य के सामने
भारत की आत्मा को खड़ा कर दिया।
उन्होंने सिखाया
सत्य केवल बोलने की वस्तु नहीं,
जीने का साहस है।
और अहिंसा—
कमज़ोरी की चुप्पी नहीं,
अन्याय के सामने
बिना घृणा के अडिग रहने की शक्ति है।
चंपारण की मिट्टी से
दांडी के समुद्र तक,
उनके कदमों ने
एक साधारण जन की पीड़ा को
राष्ट्र की आवाज़ बना दिया।
नमक की एक मुट्ठी में
उन्होंने एक बड़ा प्रश्न रख दिया
जिस देश की धरती पर
जनता का श्रम है,
उसके अधिकारों पर
किसी और का अधिकार क्यों?
उन्होंने स्वराज को
केवल शासन परिवर्तन नहीं माना।
उनके लिए स्वराज था
आत्मसम्मान,
आत्मसंयम,
आत्मनिर्भरता
और अपने कर्तव्य के प्रति
जागृत होना।
चरखे के घूमते धागे में
उन्होंने केवल वस्त्र नहीं देखा
उन्होंने देखा
एक स्वावलंबी भारत का स्वप्न,
जहाँ गाँव का श्रम
गाँव की शक्ति बने,
जहाँ हाथों का हुनर
सम्मान पाए,
और विकास की धारा
अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध
मानव गरिमा की आवाज़ उठाई,
स्त्रियों की भागीदारी को
राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा बनाया,
शिक्षा, स्वच्छता,
ग्रामोद्योग, श्रम,
सामाजिक एकता और
आर्थिक न्याय को
राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा।
उनके लिए भारत
सिर्फ़ नक्शे पर खींची
एक सीमा नहीं था
भारत वह मनुष्य था
जो उस सीमा के भीतर
सम्मान से जीना चाहता था।
और शायद
यही उनकी दृष्टि की सुंदरता थी
उन्होंने स्वतंत्रता को
केवल सत्ता के गलियारों में नहीं खोजा,
उन्होंने उसे
किसान के खेत में,
मज़दूर के श्रम में,
स्त्री के सम्मान में,
बच्चे की शिक्षा में,
और समाज की करुणा में
देखने का प्रयास किया।
उन्हें समझना
उन्हें केवल पूजना नहीं है।
क्योंकि विचारों को
प्रतिमा बना देने से
उनकी जीवंतता समाप्त हो जाती है।
उन्हें पढ़ना है,
समझना है,
जहाँ उचित लगे वहाँ अपनाना है,
और जहाँ प्रश्न हो
वहाँ सम्मानपूर्वक प्रश्न करना है।
क्योंकि सच्ची श्रद्धा
आँखें बंद करना नहीं
विचारों को आँखें खोलकर पढ़ना है।
आज भी जब
हम सत्य की राह कठिन पाते हैं,
जब हिंसा आसान उत्तर लगती है,
जब समाज में भेदभाव दिखाई देता है,
जब विकास की चमक के पीछे
किसी अंतिम व्यक्ति की आवाज़ दब जाती है
तब गांधीजी की विरासत
एक स्मृति बनकर नहीं,
एक प्रश्न बनकर सामने आती है।
क्या हमारी स्वतंत्रता
सबके जीवन में
सम्मान बनकर पहुँची?
क्या हमारी प्रगति
सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को
साथ लेकर चल रही है?
क्या हमारे भीतर
इतना साहस है
कि सत्य हमारे विरुद्ध हो
तो भी हम सत्य का साथ दें?
शायद महात्मा गांधी की
सबसे बड़ी विरासत
उनकी तस्वीर नहीं,
वह नैतिक प्रश्न है
जो उन्होंने भारत की आत्मा में
छोड़ दिया।
वर्ष बीत गए,
पीढ़ियाँ बदल गईं,
समय आगे बढ़ गया
लेकिन एक सरल-सा संदेश
अब भी जीवित है:
सत्य को जीवन बनाइए,
अहिंसा को शक्ति बनाइए,
सेवा को कर्तव्य बनाइए,
और स्वतंत्रता को
सिर्फ़ अपना अधिकार नहीं
दूसरों के सम्मान की
जिम्मेदारी भी समझिए।*
महात्मा गांधी चले गए,
पर उनका जीवन
एक प्रश्न बनकर रह गया
हम जिस भारत का स्वप्न देखते हैं,
क्या अपने आचरण से
हम उसी भारत का निर्माण भी कर रहे हैं?
शायद यही
उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी
उनका नाम लेना नहीं,
उनके उठाए प्रश्नों को
अपने जीवन में जीवित रखना।