मानव, तेरी दशा है ऐसी
मानव, तेरी दशा है ऐसी,
संघर्षरत तुझे रहना होगा।
फल की चिंता व्यर्थ है तेरी,
आगे स्वयं तुझे ही बढ़ना होगा॥
जब पत्थर में उगते पौधों का
जीवन कभी नहीं मरा करता है,
तब विपदाओं के अंधकार से
क्यों मानव मन डरा करता है॥
जैसे अधर्मी रावण भी
अपना छल नहीं चला सकता है,
वैसे ही असत्य का साम्राज्य
सत्य को कब भला झुका सकता है॥
तूने कैसे सोच लिया मानव,
सत्य पराजित हो सकता है?
जिसका आधार धर्म और साहस हो,
वह कब भय से डर सकता है?
आंधियाँ चाहे लाख चलें,
दीपक फिर भी जला करता है।
ठोकर खाकर गिरने वाला भी
एक दिन शिखरों पर चढ़ता है॥
काँटों से जो मित्रता कर ले,
उसको फूल मिला करते हैं।
संघर्षों से जो नाता जोड़ें,
वे इतिहास लिखा करते हैं॥
इसलिए उठ, कदम बढ़ा,
अपने साहस को फिर जगाना होगा।
मानव, तेरी दशा है ऐसी,
संघर्षरत तुझे रहना होगा॥