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सब तरसते हैं एक वफ़ा के लिए

BRAJESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सब तरसते हैं एक वफ़ा के लिए
        
                                                    
                            
जी रहे क्यों? फिर जफा के लिए
चाहोगे गर बुरा ना होगा भला
हाथ उठते नहीं दुआ के लिए
वक्त आया गुजर ही जायेगा
कुछ भी रहता नहीं सदा के लिए
ज़हर घोल ना इन फ़िज़ाओं में
यही बेहतर रहेगा आबो हवा के लिए
दर्द देने से परहेज कर के तो देखो
रहेगी कोई ज़रूरत नहीं दवा के लिए
हम जो चाहें सब कुछ न होता "वफ़ा"
रहना पड़ता है उसकी रज़ा के लिए
4 घंटे पहले
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