फैशन-कवियों की देह-कविता
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स्तन दिखे तो कविता तैयार,
योनि दिखी तो विमर्श तैयार,
लिंग और वृषण मिल जाएँ
तो कवि का पुरस्कार तैयार।
देह के चार शब्द पकड़कर
कल्पना का झंडा गाड़ते हैं,
दो उत्तेजक पंक्तियाँ लिखकर
उसे ‘क्रांतिकारी’ बताते हैं।
शब्दों में गहराई कम हो तो
देह को थोड़ा और उघाड़ो,
अर्थ कहीं भागता दिखे तो
कामना का पर्दा डालो।
वाह रे फैशन-कविता!
विषय नया नहीं, बस आवरण नया है।
जहाँ विचार चुप हो जाते हैं,
वहाँ शरीर ही कवि का
सबसे आसान मुहावरा बन जाता है।