नव संवतसर आ गया, जब पतझड़ के द्वार ।
प्रकृति अदभुत सजी, किया विविध श्रंगार ।।
बागों में तितली भृमर, कोंपल कलियाँ फूल ।
रक्षा का दायित्व ले, उगे.... डाल पर...शूल ।।
मधुमक्खी भिन भिन करें, चाट चाट मकरन्द ।
इधर - उधर उड़ती फिरें, वही जाने आनंद ।।
- भूपेन्द्र कुमार