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नव संवतसर

                
                                                         
                            नव संवतसर आ गया, जब पतझड़ के द्वार ।
                                                                 
                            
प्रकृति अदभुत सजी, किया विविध श्रंगार ।।

बागों में तितली भृमर, कोंपल कलियाँ फूल ।
रक्षा का दायित्व ले, उगे.... डाल पर...शूल ।।

मधुमक्खी भिन भिन करें, चाट चाट मकरन्द ।
इधर - उधर उड़ती फिरें, वही जाने आनंद ।।
- भूपेन्द्र कुमार
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5 महीने पहले

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