मन में लगी आग है,
समय की यही मांग है।
सुन लो कभी जनता की,
इसी में तो मान है।
मिट्टी की मूरत जैसे खड़े,
कुम्हार के बनाए घड़े।
लोट रहा ऊपर वाला,
जैसे साँप लोटे।
किससे कहें मन की पीड़ा,
कौन समय पर दौड़ा?
सिंहासन बत्तीसी का दरबार,
कागज थमाए, बोले—देख यार!
बड़े-बड़े वादे कर जाएँ,
कुछ न हो तो सिंहासन उतरवाएँ।
जनता को बड़ा भरोसा,
वे सिंहासन पर बैठे जैसे आसन।
दरिया भी शरमा जाए, सुनकर वचन,
करता हूँ मैं इसे नमन।
जनता कहती, यही है हमारा करम,
वो कर रहा अपना धरम।
आरती सजाए, फूल-माला लिए,
बैठे इंतजार में।
जैसे उतरा कोई भगवान हो,
कुछ तो समझो यारो!
इतना तो मान हो।
अपने पूर्वजों की मर्यादा का, थोड़ा सम्मान हो।