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जीवन का अधूरा ख्याब

Bhagwat Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो ख्याब देखे थे मैंनें वोअधूरा रह गया
        
                                                    
                            
मैंने सोचा था कुछ का.गरीबों के लिए करूं
बुजुर्गों ने मेरी बात नहीं और शादी.करा दी
नौकरी से अजि बचत.धन शादी समारोह में लगा दी
शादी के बाद घर खर्च, पत्नी की खुशी के लिए
उनकी मांगें दिन- ब -दिन बढती चली जा रही थी धीरे- धीरे मासिक वेतन कम पड़ते जा रही थी
मुझे पत्नी से पता चला कि एक नन्ही परी आने वाली थी
यह खबर परिवार और समाज में वायरल हो गई थी
घर में मजमा लगने लगा, परिवार के लोग आने लगे
उनकी खातीरदारी करना मजबूरी बन गई
तेल की कढाही हमेशा चूल्हे में चढी रहती थी
वेतन समाप्त कर्ज राशी बढ़ती चली जा रही थी
कर्ज की राशी हाल- बेहाल हुए जा रहा थी
जो ख्याब मैने देखे थे कि गरीबों की मदद करने की
बात को छोड़िए मुझे अब ममद की आन पड़ी थी
विवाह वो बोझ है कि मेरी खटिया खड़ी थी
जो ख्याब मैने देखे धे वो पूरा होने की बात छोड़िए
अपनी जरुरतें पूरा करने में कर्ज का बोझ रह गया
- भागवत प्रसाद नायक
6 महीने पहले
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