आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जीवन का अधूरा ख्याब

                
                                                         
                            जो ख्याब देखे थे मैंनें वोअधूरा रह गया
                                                                 
                            
मैंने सोचा था कुछ का.गरीबों के लिए करूं
बुजुर्गों ने मेरी बात नहीं और शादी.करा दी
नौकरी से अजि बचत.धन शादी समारोह में लगा दी
शादी के बाद घर खर्च, पत्नी की खुशी के लिए
उनकी मांगें दिन- ब -दिन बढती चली जा रही थी धीरे- धीरे मासिक वेतन कम पड़ते जा रही थी
मुझे पत्नी से पता चला कि एक नन्ही परी आने वाली थी
यह खबर परिवार और समाज में वायरल हो गई थी
घर में मजमा लगने लगा, परिवार के लोग आने लगे
उनकी खातीरदारी करना मजबूरी बन गई
तेल की कढाही हमेशा चूल्हे में चढी रहती थी
वेतन समाप्त कर्ज राशी बढ़ती चली जा रही थी
कर्ज की राशी हाल- बेहाल हुए जा रहा थी
जो ख्याब मैने देखे थे कि गरीबों की मदद करने की
बात को छोड़िए मुझे अब ममद की आन पड़ी थी
विवाह वो बोझ है कि मेरी खटिया खड़ी थी
जो ख्याब मैने देखे धे वो पूरा होने की बात छोड़िए
अपनी जरुरतें पूरा करने में कर्ज का बोझ रह गया
- भागवत प्रसाद नायक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर