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घर में पढ़ी लिखी बहू आई है

Bal Krishan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर में पढ़ी लिखी बहू आई है
        
                                                    
                            

जलते तन, प्यासे मन, से जो पूछा मैंने
गौ मैया क्या हाल आपने बनाया है
थोड़ा पूंछ हिलाकर, पलकें छपकाकर बोली
घर में नया मेहमान जो आया है

रात को देर से सोती
उठे जो शिकर दोपहर में
मेरी भूख की उसको क्या परवाह
जो खुद नास्ते को जाए बाजार में
सिर पर मैं पानी लाऊं
चारा मिले खलिहान मे
सौ बार मुझको कोसे
रह गई तेरी गुलाम मैं

माँ का उसकी जो फोन आता
कहती पशुओं में मुझे छोड़ दिया
रो रो दुखडे़ लाख सुनाती
किस घर में मुझे बेच दिया

तेरे घर की मैया थी मैं
जब तक मैंने दूध दिया
सूखते ही दूध मेरे को
घर से मुझको खदेड़ दिया

पड़ोसी की दुल्हन शहर गई
अपने पिया के साथ
सिर्फ मुझे ही बांध रखा है
तेरे खूंटे के साथ
राजकुमारी थी मैं
हूँ मैं graduate पास
गोबर उठाते सन गए मेरे
हाए रे कोमल हाथ

फ़िक्र छोड़ मेरी तू ऐ बंधु
कलयुग के ये अवतार हैं
अभी तो पशु गया घर से
तेरे माँ बाप कतार में
पूजे ये जग मुझे
सभी देवी - देवताओं का मुझमे वास है
भूल गया हर हिन्दू
जिसको भवसागर पार मैंने करवाया है



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7 वर्ष पहले
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