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ज़हर का हिसाब

Bajrang

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मरने के लिए तो बस इक घूँट ही काफ़ी है,
        
                                                    
                            
पर जीने का यहाँ हर रोज़ अलग हिसाब है।
मौत तो इक पल में ख़ामोश कर देती है,
ज़िंदगी तो हर सांस में ज़हर की किताब है!
घूँट-घूँट रोज़ जिसे पीते रहे मुस्कुरा कर,
ज़माना समझता रहा वो हमारा स्वभाव है।
छाले पड़े जो रूह पर, दिखे नहीं किसी को,
चेहरे की हँसी के पीछे छुपा हुआ घाव है।
जब तलक सहते रहे, हम बड़े शरीफ़ रहे,
ज़ुल्म की हर हद को भी ख़ामोशी से पीते रहे।
ख़ता उनकी थी, मगर हमने ही माफ़ी माँगी,
ख़ुद को मिटा-मिटा कर भी अपनों के लिए जीते रहे।
मगर सब्र की भी इक हद होती है दुनिया वालो,
पत्थर भी टूटता है जब चोट बेहिसाब हो!
कब तक झुके सर जब साँसों पे ही पहरा हो,
कब तक दबे लब जब इंसाफ़ महज़ ख़्वाब हो?
टूटा जो सब्र तो आवाज़ ज़लज़ला बन गई,
उठी जो नज़र तो बगावत का नाम मिला।
बरसों की सहनशीलता जब अंगार बनी,
तो महफ़िल में हमको ही मुजरिम का ख़िताब मिला!
कोई ये नहीं कहता कि 'हमने ही मजबूर किया था',
कोई ये नहीं सोचता कि कितना सताया था।
मुस्कुरा के कहते हैं सब अपना दामन बचाकर—
'हमें तो पहले से पता था, ये इंसान ही ऐसा था!'
4 घंटे पहले
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