आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़हर का हिसाब

                
                                                         
                            मरने के लिए तो बस इक घूँट ही काफ़ी है,
                                                                 
                            
पर जीने का यहाँ हर रोज़ अलग हिसाब है।
मौत तो इक पल में ख़ामोश कर देती है,
ज़िंदगी तो हर सांस में ज़हर की किताब है!
घूँट-घूँट रोज़ जिसे पीते रहे मुस्कुरा कर,
ज़माना समझता रहा वो हमारा स्वभाव है।
छाले पड़े जो रूह पर, दिखे नहीं किसी को,
चेहरे की हँसी के पीछे छुपा हुआ घाव है।
जब तलक सहते रहे, हम बड़े शरीफ़ रहे,
ज़ुल्म की हर हद को भी ख़ामोशी से पीते रहे।
ख़ता उनकी थी, मगर हमने ही माफ़ी माँगी,
ख़ुद को मिटा-मिटा कर भी अपनों के लिए जीते रहे।
मगर सब्र की भी इक हद होती है दुनिया वालो,
पत्थर भी टूटता है जब चोट बेहिसाब हो!
कब तक झुके सर जब साँसों पे ही पहरा हो,
कब तक दबे लब जब इंसाफ़ महज़ ख़्वाब हो?
टूटा जो सब्र तो आवाज़ ज़लज़ला बन गई,
उठी जो नज़र तो बगावत का नाम मिला।
बरसों की सहनशीलता जब अंगार बनी,
तो महफ़िल में हमको ही मुजरिम का ख़िताब मिला!
कोई ये नहीं कहता कि 'हमने ही मजबूर किया था',
कोई ये नहीं सोचता कि कितना सताया था।
मुस्कुरा के कहते हैं सब अपना दामन बचाकर—
'हमें तो पहले से पता था, ये इंसान ही ऐसा था!'

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर