कंधों पर बस्ता, आँखों में सपने,
जेबों में सिक्के, मगर इरादे अपने।
कभी फीस की चिंता, कभी घर की मजबूरी,
कभी अपनों से दूरी, कभी नींद अधूरी।
किताबों के बीच हम खुद को तलाशते हैं,
टूटते हैं भीतर, मगर बाहर हँसते हैं।
किससे कहें कि दिल पर क्या गुजरती है,
जब मेहनत के बाद भी मंज़िल दूर दिखती है।
कभी भूखे पेट भी कक्षा में जाते हैं,
कभी आँसू छिपाकर मुस्कुराते हैं।
दुनिया कहती है— अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है?
उन्हें क्या पता, हमारे कंधों पर कितना बोझ रखा है।
हम वो नहीं जो मुश्किलों से हार जाएँगे,
हम गिरेंगे सौ बार, फिर भी उठकर आएँगे।
हमारी ठोकरों में भी एक कहानी होगी,
हमारी मेहनत ही हमारी जुबानी होगी।
हम छात्र हैं, कोई मजबूरी नहीं,
हमारी खामोशी कोई कमजोरी नहीं।
हम कल के भरोसे आज नहीं जीते,
हम वो हैं जो हालातों के आगे नहीं झुकते।