शब्दों से घिरी-सी मैं,
कागज़ से दूरी बना रही हूँ।
पता है, जीतने को आसमान है, फिर भी
डिब्बी में सिमटती जा रही हूँ।
अकेलापन तो नहीं जीवन में, फिर भी
जाने क्या रोग है।
पूरा दिन फ़ोन में मग़रूर हूँ,
फिर भी रात को कमर दर्द में स्प्रे लगा रही हूँ।
हर दिन जाने किस ख़बर का इंतज़ार
सुबह से करती हूँ मैं।
दिन होता है, दोपहर आती है,
गिलहरी आकर शाम की बता जाती है।
रात में कुछ बच्चों को सिखाती हूँ,
फिर एक बार आँगन में जाती हूँ मैं।
और ख़बर तो कुछ नहीं अगले दिन की होती है,
फिर आँखें मूँदकर अगले दिन
सब दोहराती हूँ मैं।
जीवन में कुछ ख़ास नहीं,
ऐसे ही मन को बहलाती हूँ मैं।
मन वापस से कहता है मुझसे—
जीने को आसमान है,
और तुम…
बस सिमटती जा रही हो।