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देवभूमि की चीख

Ayush Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गढ़वाल की घाटी रोती है, उत्तरकाशी हैरान है,
        
                                                    
                            
जाति की अंधी भट्टी में, झुलस रहा इंसान है।
देवभूमि के तुंग शिखर भी, शर्म से नीचे झुकते हैं,
जब झूठी साख की खातिर, मासूमों के दम घुटते हैं।
वह सात जून की काली रात, जब खोलगढ़ थर्राया था,
लड़की के एक बुलावे पर, केतन मिलने आया था।
न बेटे की कोई गलती थी, न बेटी का कसूर वहाँ,
पर झूठी आन की खातिर ही, फैला वहशी फितूर वहाँ।
केतन और दिवाकर को, उस रात वहाँ घेरा जाता,
रॉड और लाठी-डंडों से, बेरहमी से तोड़ा जाता।
यशवीर और विद्या सिंह ने, दानव रूप दिखाया था,
अस्पताल के रस्ते में ही, केतन का दम घुट आया था।
जागो ओ भारत के लोगों! सोई आत्मा आज जगाओ,
इस ऊंच-नीच की सड़ी सोच को, मिलकर आग लगाओ।
डिग्री की आड़ में आखिर, कब तक आदिमानव बने रहेंगे?
अगर आज मौन रहे हम सब, तो हर दिन एक केतन खोएंगे।
कक्षा 12 के आयुष सिंह की कलम, यह कड़वा सच गाती है,
सोए हुए इस पूरे समाज को, झकझोर जगाती है।
अब और नहीं सहना हमको, यह ज़ुल्म पुराना सदियों का,
इंसाफ मिले केतन को अब, यही नारा हो गलियों का।
4 महीने पहले
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