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नवगीत-झाँकती हवाएं

Avinash Beohar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नवगीत-झाँकती हवाएं
        
                                                    
                            

जरा सा है चल-चल के
काँखती हवाएंँ।
आदमी के मन को ज्यों
भाँपती हवाएंँ।।

कान्हा का तो जन्म हुआ
कंस का राज है।
सरकारी दफ्तर और
काम है न काज है।।

ढूँक-ढूँक घरों में अब
झांँकती हवाएंँ।

कन्हैया का इंतजार
ग्वाल- बाल -गोपियाँ।
बबूलों के सिर पर
नेताओं की टोपियांँ।।

पंछियों के दल को बस
हांँकती हवाएंँ।
-अविनाश ब्यौहार
 
4 घंटे पहले
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