नवगीत-झाँकती हवाएं
जरा सा है चल-चल के
काँखती हवाएंँ।
आदमी के मन को ज्यों
भाँपती हवाएंँ।।
कान्हा का तो जन्म हुआ
कंस का राज है।
सरकारी दफ्तर और
काम है न काज है।।
ढूँक-ढूँक घरों में अब
झांँकती हवाएंँ।
कन्हैया का इंतजार
ग्वाल- बाल -गोपियाँ।
बबूलों के सिर पर
नेताओं की टोपियांँ।।
पंछियों के दल को बस
हांँकती हवाएंँ।
-अविनाश ब्यौहार