आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नवगीत-झाँकती हवाएं

                
                                                         
                            नवगीत-झाँकती हवाएं
                                                                 
                            

जरा सा है चल-चल के
काँखती हवाएंँ।
आदमी के मन को ज्यों
भाँपती हवाएंँ।।

कान्हा का तो जन्म हुआ
कंस का राज है।
सरकारी दफ्तर और
काम है न काज है।।

ढूँक-ढूँक घरों में अब
झांँकती हवाएंँ।

कन्हैया का इंतजार
ग्वाल- बाल -गोपियाँ।
बबूलों के सिर पर
नेताओं की टोपियांँ।।

पंछियों के दल को बस
हांँकती हवाएंँ।
-अविनाश ब्यौहार
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर