कीमत न जाने हर कोई
मोती मैं नैन फुलवारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
जो है त्याग की मूर्ति सजीव
उसके हृदय की हूँ आवाज़
निष्कपट और निश्छल हूँ तो
कर देता भविष्य आगाज़
जिसके कारण मैं द्रवित निकलता
करता निर्यण उस प्रानी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
एक बार मैं बहा जानकी
के नेत्रों से दण्डक वन में
नष्ट हो गया रावण का कुल
श्रीराम के द्वारा महारन में
बना अस्त्र पाप के नाश का
मैं मिथिलेश कुमारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
मैं फूटा कुरुवंश के कारण
सती द्रौपदी नेत्र से
समाप्त हो गए भरत के वंशज
पूरे भारत क्षेत्र से
साक्षी हूँ मैं दुख व कष्ट का
पाण्डवों की प्यारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
मीरा के नेत्रों में प्रेम का
रूप बना कर रहा था मैं
जग के ताने विष के प्याले
मीरा संग सह रहा था मैं
समाई हरि की मूर्ति में शव
न मिला राजकुमारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
पद्मावती ने गिराया नही मुझे
गई नही संकट से भाग
बहा नही मैं सुखा गई मुझे
सतीत्व भरी जौहर की आग
जो बह जाता बनता प्रलय फिर
खिलजी अत्याचारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
जिस भूमि पर गिरूं वहाँ पर
आ जाता भूचाल है
निर्दयी और निष्ठुर व्यक्ति का
हो जाता बुरा हाल है
नारी द्रोही को दण्ड हूँ देता
कठोर और बड़ा भारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
कीमत न जाने हर कोई
मोती मैं नैन फुलवारी का
व्यर्थ नही हूँ जाता कभी भी
मैं हूँ आँसू नारी का
- अवधेश कनौजिया
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें