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परिवर्तन के झुनझुने

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            परिवर्तन के झुनझुने
        
                                                    
                            
परिवर्तन के झुनझुने
कुछ हमने बजाये हैं
बेसहारा मजबूर के चेहरे
सुनकर मुस्काये हैं
दबा दिये तुमने सारे स्वर
कुछ ऐसे भूकम्प जगाये हैं।
जनक्रान्ति के गीत
कुछ हमने गाये हैं
पराधीन भावुक मन ने
अपने मन में सजाये हैं
पुराने कानों के परदों ने
कुछ जलभुनकर ठुकराये हैं।
अरमानों के ज्वालामुखी
कुछ हमने जगाये हैं
सूखे आँसू की जलती आँखों ने
अभावों से भी शीतल बताये हैं
सब अपनों ने ही खरीद लिये
कुछ ऐसे धन के अंबार लगाये हैं।
महाप्रलय की अंधड़ आँधी
कुछ हमने चलायी हैं
उखड़. जाये सब अंधविश्वासी ड़ूंड़
देख नवचेतना हर्षायी हैं
सब फूटते अंकुरों को दबा दिये
कुछ ऐसे ही ड़ूंड़ों ने रोक लगायी हैं।
घायल दिल के युवकों को
कुछ हमने सहलाया है
अतीत की उफनती लहरों ने
भँवर में भविष्य को फँसाया है।
अंधेयुग के आकाओं ने
कुछ ऐसे ही सदियों से ड़ुबाया है।
पथराई हुई आँखों को
कुछ सपने हमने दिखाये हैं
अन्यायपूर्ण हरकतों-दलीलों से
वे अभी भी पथराये हैं
बुदबुदाते हताश-उदास वे
कुछ ऐसे ही चीखे चिल्लाये हैं।
परिवर्तन के झुनझुने कुछ हमने बजाये हैं।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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