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पहनी है धरती ने ज्योति की पायल

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहनी है धरती ने ज्योति की पायल
        
                                                    
                            
आज आसमाँ से ये जाकर कह दे कोई
सितारों की महफिल कहीं और सजायें।
पहनी है धरती ने ज्योति की पायल,
दीपों के घुंघरू, स्वर झाँझन सुनायें।
खैर नहीं तेरी ओ अमावस्या के अंधेरे
धरती से उठा ले तू आज अपने ड़ेरे।
रोशनी को देख अंधेरा थरथराया
खूब चीखा पटाखों में, अंधेरे का हुआ सफाया।
झूमकर नाची है दीवाली, आज बनकर दीवानी
मानो पड़.नी है शादी की, उसकी भाँवरे रूहानी।
नहाती है रजनी,प्रभाती कुमकुमी उजाले में
आती है दीवाली लिये,कई नई सौगातों में।
खुशियाँ से बजने लगी,आज मन में शहनाईयाँ
स्वप्न सारे टूट गये, विश्वास ने ली अंगड़ाईयाँ।
फूलों की मुस्कान सा, आज संगीत सजा है
प्यार की तरंगों का, नया गीत जगा है।
पीव खोली है आँखें,मन चेतना लहरायी है
खुशियों को पंख लगे, ज्योति दीपक में आयी है।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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