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मौत का अपमान

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौत का अपमान
        
                                                    
                            
एक दुधमुंहे शिशु का शव

कारूणिक आर्तनाद के बीच

सुर्ख लाल कपडे में लिपटा

अपने घर से निकला।

जिसे कलेजे पर पत्थर रख

उसकी जननी ने लोगों को सौंपा।

उस परिवार में छाया रहा मातमी शोक

जिसमें घर की दीवालें तक नम थी।

ये सुबह उनके परिवार पर

बिजली बनकर टूटी।

बुझ गया उनके कुल का दीपक

जिसके कारूणिक रूदन का कोलाहल

झकझोर देता है इंसानियत को

मौत की खामोशी से टकराकर

हवा रोक देती है हर चलते इंसान को।

शुभ मुहूर्त की चौखट पर

दस्तक देने कोई हाथ

निवाला लिये ऐसे में मुंह तक नहीं जाता

शांत हो जाती है हर चूल्हे की आग

जिसने मौत की करतूत देखी सुनी व सूंघी होगी।

इस तरह के अन्जाने खेल खेलने पर

सभी कोसते हैं ईश्वर को

सदियों से यही जीवन को

विदाई और मौत को अलविदा करने की चर्चा रही है।

किन्तु हे मौत

आज हमने झुठला दी है तेरी इस चर्चा को

और अपनायी है तेरे अपमान की ये नई नीति

जिससे शरमाकर तू गड़ जायेगी मानवता पर।

मानवता से हमें क्या लेना-देना

बहुत रोते आये है उसके लिये

जितना रोये है उतनी ही मानवता आँसू बनकर बही है।

अब हमारी आँखों में एक बूंद आँसू भी

मानवता के लिये नहीं रह गया है

आँसुओं की जगह अब आँखों में

हैवानियत का लावा रह गया है

इसलिये मौत तेरे अपमान की

ये नई नीति हम ने सामूहिक रूप से मिलकर अपनाई है

जिसमें उस जननी के कलेजे के टुकडे को

सुर्ख लाल कपडे में श्मशान जाते देखा

तब इस शोकाकुल वातावरण में

हम बगल बाजू के कमरे में तेरा जश्न मना रहे थे।

शादी की औपचारिकता रस्मों के बीच

हूसी ठ्टठा कर मिठाईयां खा रहे थे।

शादी तो वैसे हो चुकी थी

लेकिन यह अनौपचारिकता थी।

मिठाईयों के आगे हे मौत

हम तुझे भूल चुके थे

इसलिए खून भरे शोकाकुल वातावरण में

हम खुशी से जिंदगी का जश्न मना रहे थे।

हे मौत क्या इंसानियत का रक्त करती

यह रक्तिम परिणति की पुनरावृत्ति

हम कभी अपने घर कर सकेंगे

क्या हमारी आँखों में

इस हैवानियत के दौर पर मंथन करते

आत्मवंचना हेतु कभी समय होगा।

मौत शायद तेरे अपमान की

यह ढिठाई मैं फिर कभी न कर सकूँगा।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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