मैं कोई देवता नहीं
मैं उन्हें कैसे समझाऊ
कि मैं कोई देवता नहीं हूँ
एक सीधा-सादा इंसान हूँ
जो इंसानियत से जीना चाहता हूँ।
पर वे मानते ही नहीं
मुझे देवता की तरह पूजे जाते हैं,
जाने क्यों मुझ इंसान को ये देवता बताते है।
ये दुनिया बडी जालिम है
जो हम जैसे शैतानों के पीछे पडी है
हम कभी इंसान तो न बन पाये
पर ये देवता बनाने पर अडी है।
किन्तु मैं देवता नहीं बनना चाहता हूँ
एक इंसान बनना चाहता हूँ।
इनके लिये किसी को भी
देवता बनाना कितना सरल है
ये हर सीधेसादे इंसान को
पहले पत्थर जड़ बनाते हैं।
उजाडकर दुनिया उसकी
ये उसे नीरस बनाते है।
जिन्हें ये देवता बनाते हैं
अक्सर वह इनका सगा सम्बधी होता है
इनका अपना तो कम
इनके अपनों का सपना होता है।
दूसरों के सपनों को चुराकर
ये अपनी हकीकत बनाते हैं।
हर प्रेम करने वालों को
निजी स्वार्थ सिद्घी हेतु ही
ये पीडा का ताज पहनाकर
बेबश और लाचार बनाते हैं ।
दो प्रेमियों को जुदा करने को
ये अपना फर्ज बताकर निभाते हैं
उनकी ऑखों से जुदाई के ऑसुबहाकर
उनके ह्दय में गमीं का सैलाव लाते हैं।
दो प्रेम करने वाले इंसानों को
ये पहले जिन्दा लाश बनाते हैं
प्रेम की लाश ढोने वाले हर इंसान प्रेमी को
ये देवता बनाते हैं।
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