विज्ञापन

खाली हाथ

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खाली हाथ
        
                                                    
                            
सारी रात
नींद आँखों से कोसों दूर है
ख्यालों का पुलिंदा
मधुर पल की चाह में
एक पल के लिये
जीने को उत्सुक है।
नितांत अकेला,
कुर्सी पर बैठा आदमी
विचारों में ड़ूबा
तलाश रहा है उस पल को
और वह मधुर पल
उसके हाथों से खिसक कर
बहुत दूर असीम में
सरकता हुआ चला जा रहा है।
ख्यालों के पुलिन्दे की परतें
कुर्सी और आदमी के चारों ओर
ढेर बनी उन्हें दबा रही है
और हाथ न आती उन परतों को
पीव वह आदमी, प्याज की तरह
परत दर परत छीलने को विवश है
उसके मिट जाने तक।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile