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हम जो छले, छलते ही गये

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                             हम जो छले, छलते ही गये 
        
                                                    
                            
15 अगस्त की वह सुबह तो आयी थी
जब विदेशी आंक्रान्ताओं से हमें
शेष भारत की बागड़ोर मिली
हम गुलाम थे, आजाद हुये
आजादी के समय भी हम छले गये थे
आज भी हम अपनों के हाथों छले जा रहे है।
भले आज हम आजादी में साॅसे ले रहे है
पर यह कैसी आधी अधूरी आजादी ?
पहले अंगे्रेजों के जड़ाऊ महल बनाते थे
अब अपने ही तथाकथित नेताओं के
पिछलग्गू बने सैकड़ों हाथ मजदूर ही तो है?
तुम खुश हो विदेशियों की गुलामी से
तुम्हारें पूर्वज मुक्त हो गये है और
भारत आजाद देश हो गया है
पर यह भूल गये तुम्हारे पूर्वज गुलाम थे अंग्रेजों के
तुम भी गुलाम हो, अपनों के
तुम उन लोगों में हो जो कभी आजाद नही होते
तुम उन लोगों में हो जो गुलाम होकर भी नहीं होते
तुम्हारे तथाकथित अपनों ने
हजारों हाथों को तोड़ा है
हजारों कंधें इन्होंने उखाड़कर फैके है
तुम सिर्फ मजदूर हो,मजबूर ही मरोंगे।।
तुम्हारे दादा मजदूर थे, तुम मजदूर हो
तुम्हने अपने माॅ-बाॅप के साथ मजदूरी शुरू की
घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, गाॅव छोड़ा
शहर की चकियाचैध में तुम बना रहे हो अटटालिका
तुम्हारी बेटी कब जवान हो जाती है
तुम्हारे बच्चे सड़कों पर, कचरेघरों में
तलाशते है अपना भविष्य।
टूट जाते है वे दो जून की रोटी के लिये
सड़कां के किनारें, बसस्टेण्ड या
रेल्वेस्टेशनों के कौने-कुचेरे में होता है
तुम्हारा बिस्तर,
तुम्हारी गुदड़ी में आबारा कुत्ते भी
हाड़ कपा देने वाली ठण्ड से बच जाते है।
कोई एक दो नहीं तुम करोड़ों में हो
जिनका कोई भविष्य नहीं है
तुम्हें 15 अगस्त की आजादी का पता नहीं
तुम्हने कभी नहीं देखी परेड़
तुम्हें कोई भी नहीं खिलाता मिठाई
तुम 15 अगस्त 26 जनवरी को भी
चहकते मिल जाते हो,सिर्फ इसलिये
उस दिन तुम तिरंगा बेचकर
दो जून की रोटी का जुगाड़ करके
पीव समर्पित हो जाते हो बेगारी के लिये।।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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