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चेतनाशून्य मानव

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चेतनाशून्य मानव
        
                                                    
                            
हे भीड़ के अभिन्न अंग मानव,

मैंने तुझे चेतनाशून्य होते देखा है।

गहन संवेदनाओं का आहत क्रन्दन

परम शाश्वततता की रेखा है।

सौन्दर्यवान की अलौकिक निर्मलता

सहज निर्वस्त्रता की नियति है।

समृष्टि की अक्षुण्यता

अस्तित्वगत की निज प्रकृति है।

सुन्दरता का प्रथम वरण

प्रणेता ने सृष्टिकरण किया।

जीवन का प्रथम स्पर्श चरण

नग्न पुष्प जीव ने जन्म लिया।

सृष्टा का पाकर कोमल स्पर्श

नग्नता है निर्मल बनी।

अपने जन्म का जब छाया हर्ष

तब नग्नता है शरीर सनी

अरे मानव इन बातों से क्यों तू सुप्त है।

इसीलिए बावरे तेरी

मैंने चेतना पायी लुप्त है।

इसीलिये चौराहे पर खडे

नंगे पागल को बेदर्दी

तू पत्थरों से मार रहा है।

और अपने वहशीपन की हवस

तू उस पागल पर निकाल रहा है।

अरे नंगा होना कोई अपराध नहीं है

उस पागल का नंगा रहना

हो सकता है उसकी विवशता हो

या अतिरेक की सहजता हो।

जो ईसा-मोहम्मद

बुद्घ महावीर को उपलब्ध हुई है।

अरे मानव सारे बाजार नंगा खडा होना

बडी हिम्मत का काम है

जो किसी अद्भुत घटना का परिणाम है।

शायद पागल के दिल को

यह बात छू गई हो

या उसके अन्तस तम में

उसे कुछ किरणें नजर आई हो

परन्तु तू क्यों नंगाई पर इतर आया है

और उस पागल पर तूने बहसी

क्यों पत्त्थर बरसाया है।

अरे कभी भूल कर भी नंगाई पर

पत्थर न बरसाना

वर्ना मुश्किल पड़ जायेगा

खुदा और खुदाई में फर्क कर पाना।

नंगाई पर पत्थर बरसाने से पहले

तू अपनी अन्तिम परिणिति जान लेना

जिनको कहता है अपना

उनकी प्रीति का ज्ञान लेना।

ये तुझे आजीवन अपनायेंगे

पर मरने पर तुझे नंगा ही दफनायेंगे।

इसीलिये पीव तुझसे यह कहता है।

तू कभी भीड़ में चेतनाशून्य न होना

वर्ना मुश्किल पड़ जायेगा

नंगे और नंगाई में फर्क कर पाना।

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