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अनोखा संगम

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनोखा संगम
        
                                                    
                            
देखता हूँ मैं,

ये बात कितनी अजीब है

चन्द्र और सूर्य गगन में

आज कितने करीब है।

सूर्य किरण शर्माती लाल हो रही है

धरा कली से जैसे गुलाब हो रही है

ये प्रभात का चांद कुछ ऐसा भा रहा है

रोशनी से अपनी वह जग को लुभा रहा है

सूर्य चांद का प्रभात में,कुछ अनोखा ये संगम

क्यों दुनिया न बूझे,देख रूप ये विहंगम।

वृक्ष झूम उठे, समीर लोरी सुना रहा है

बैठा दूर जंगलों में,सन्नाटा भी गा रहा है

जगतपति का अल्हाद,अस्तित्व लुटा रहा है

पात्र होगा वही उसका, अलख प्रेम की जो जगा रहा है

सोये हुओं को सतगुरू,नाद अनाहद जगा रहा है

'पीव'जागे हुओं का शुभ प्रभात आ रहा है।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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