खेत खलिहानों से हो कर भी एक दुनिया गुजरा करती थी,
जो मेरे बाबा के बड़े से आंगन में आ कर ठहर जाया करती थी।
अब ये शहरों सी दौड़ती भागती सड़कों वाली दुनिया,
जो उस डिब्बे से घर में आ कर सिमट जाया करती है।
अब ये मुझे कहां ही रास आयेगी।
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