मुफ़लिसी का दर्द, सीने से लगाये चल दिया
भूख से आँते उलझती, पेट थामे चल दिया
हाथ जो अबतक सृजन से शहरों को आकार दे
ईंट, पत्थर जोड़े कोई, घर किसी के नाम से
दूर अपनों से, वो अपनों के ही खातिर जी रहा
इस शहर में मौत से बेहतर है घर को चल पड़ा
शहरों के इन सरहदों को लांघे भी कैसे भला
सरकार तेरे खौफ के किस्से सड़क करती बयां
कबतलक चलता रहे, पैरों में है पाबंदियाँ
रोटी, दो रोटी, नमक खाया और कुछ रख लिया
रेल जो उसे ले के आयी, अब नहीं ले जा रही
खैर, उसे गावँ तक ले जाएगी ये पटरियाँ
हालात का मारा हुआ इंसान भी इंसान क्या
थक के यूँ सोया की, मानो सेज हो गयी पटरियाँ
सोया रहा एक लाश सा, सुनता नहीं, हिलता नहीं
रेल ऊपर से गुजर गई, अब ख्वाब कोई जिंदा नहीं
रोटी ही तो खींच लाई थी उसे हालात तक
जिस्म टुकड़ों में बंटा, बिखरी हुई है रोटियाँ...…
पाण्डेय आशिष कौशिक
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