विज्ञापन

बाल दुर्व्यवहार तितली

Ashika Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नन्ही सी तितली थी वो
        
                                                    
                            
अचानक एक दिन मुरझा गई
ना जाने कैसी बात थी वो
जो जिंदगी उसे सिखा गई

घर के आंगन में तो वो
तितली सी घूमा करती थी
पकड़ने चलते थे जब बाबा
तितली सी उड़ जाया करती थी
लेकिन कोई तो ऐसी बात थी
जो उसे सताया करती थी

कुछ नही सब ठीक है बाबा
बस यहीं बताया करती थी
पायल की झनकार सी थी वो
अब गुमसुम क्यूं रहने लगी

कुछ फूलों में ज़हर है सुनलो
तितलियों से कहने लगी
आखिर ऐसी क्या बात थी वो
जो तितली को मुरझा गई
ना जाने कैसी बात थी वो
जो जिंदगी उसे सिखा गई।।

धन्यवाद

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all