विज्ञापन

लड़खड़ा के चल

Aryavrat Anand

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            

सफर हो रात में तो चाँद से आँखें मिला के चल


सूरज की छाँव में आया तो फिर आँखें झुका के चल

यही चाहत मेरी ना हुस्न को रुस्वा किया जाए
अदाएं जब तेरी सुंदर कली तो फिर दिखा के चल

यहाँ सब टूटते तारों से भी मांगेगे कुछ ना कुछ
कहीं तू चाँद सा रौशन है तो फिर बच बचा के चल

घड़ी में रंज के हँसना कहीं मुमकिन नहीं लेकिन
खुशी के वक्त में आँखों में कई आँसू दबा के चल

किये सौदे जो खुशियों के तेरे गम के लिये मैंने
नहीं जब मेरे हक में इश्क तो फिर दिल दुखा के चल

'शुभम' अपने कभी बाहों में जाना थाम ले तुमको
नशे में नींद के तू भी कभी तो लड़खड़ा के चल ।


-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10960 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13199 कविताएं

View Profile