विज्ञापन

ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे आगे बढ़ते जातें हैं

Arvind Singhania

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे आगे बढ़ते जातें हैं,
        
                                                    
                            
कितनी भी हम कोशिश कर लें मगर पिछड़तें जातें हैं

जिस थाली में खातें हैं हम, छेद उसी में करतें हैं,
भ्रष्टाचार की नई सीढियां हर दिन चढ़तें जातें हैं।

हम कितनें सीधे-सच्चे हैं, दुनिया को दिखलातें हैं
अपनी कालिख़ हम गैरों के माथे मढ़ते जातें हैं।

जानें क्या होने वाला है, सोच-सोच घबराता हूं
उग आये कंकरीट के जंगल, बाग़ उजड़ते जातें हैं।

अपनें घर का शजर देखकर मैं थोड़ी दहशत में हूं,
बदलावों की तेज़ हवा है, पेड़ उखड़ते जातें हैं।

आगे बढनें की चाहत में अपनें पीछे छूट गए,
अफ़रा-तफ़री मची हुई है लोग बिछड़ते जातें हैं।

खुदगर्जों की इस दुनियां में अपनों ने दम तोड़ दिया,
घर-घर में संग्राम मचा है और सब लड़ते जाते हैं।

कह देना 'अरविन्द' ख़ुदा से मुझको आकर ले जाये,
जीवन अब पतझड़ लगता है, पत्ते झड़ते जाते हैं।

- अरविन्द कुमार 'सिंहानिया'

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Dasani

15 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10521 कविताएं

View Profile