ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे आगे बढ़ते जातें हैं,
कितनी भी हम कोशिश कर लें मगर पिछड़तें जातें हैं
जिस थाली में खातें हैं हम, छेद उसी में करतें हैं,
भ्रष्टाचार की नई सीढियां हर दिन चढ़तें जातें हैं।
हम कितनें सीधे-सच्चे हैं, दुनिया को दिखलातें हैं
अपनी कालिख़ हम गैरों के माथे मढ़ते जातें हैं।
जानें क्या होने वाला है, सोच-सोच घबराता हूं
उग आये कंकरीट के जंगल, बाग़ उजड़ते जातें हैं।
अपनें घर का शजर देखकर मैं थोड़ी दहशत में हूं,
बदलावों की तेज़ हवा है, पेड़ उखड़ते जातें हैं।
आगे बढनें की चाहत में अपनें पीछे छूट गए,
अफ़रा-तफ़री मची हुई है लोग बिछड़ते जातें हैं।
खुदगर्जों की इस दुनियां में अपनों ने दम तोड़ दिया,
घर-घर में संग्राम मचा है और सब लड़ते जाते हैं।
कह देना 'अरविन्द' ख़ुदा से मुझको आकर ले जाये,
जीवन अब पतझड़ लगता है, पत्ते झड़ते जाते हैं।
- अरविन्द कुमार 'सिंहानिया'
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