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उजाले से अंधेरों की तरफ

ARVIND KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उजाले से अंधेरों की तरफ जब जाता है मन
        
                                                    
                            
अकेला बेसहारा जब घबराता है मन

हालातों से लड़ते हुए जब कभी डगमगाता है मन
हंस हंस के आंसू जब छुपाता है मन

धोखे और फरेब से भरी शक़्ल के बाजर में
किसी ग़मगुसार को जब पाता है मन

अब्र के पिघलने के बाद अफताब सा होता है
जब ज़ार-ज़ार आंख बरसाता है मन
2 घंटे पहले
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