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नया साल

Arti Jha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नए साल का नया संकल्प
        
                                                    
                            
मन हो मन्दिर प्रांगण सा
गरल ना हो राग द्वेष का
भक्ति की बहती बयार हो
गूँजायमान रहे हर दिशा
चहचहाहट हो चिड़ियों सी
चेहरे पर मुस्कान हो ऐसी
प्रांगण में लहलहाते वृक्ष जैसे
जीवन में रंगों की बरसात ऐसी
जैसे बिछी हर ओर रंगोली हो
हृदय हो उमंग से सराबोर ऐसे
जैसे प्रांगण में झाँक रहा सूरज हो
नर नारी ऊँच नीच से दूर मानव
दीपमाला सजा हर आँगन हो
निकले वाणी, मधुर हो ऐसी
जैसे झंकृत मन्दिर की घंटी हो
मानवता में भरे उजास ऐसी
मंगलमय प्रभात मंदिर का हो
स्वप्न पाश में जकड़ी अभिलाषाएं
मुक्त हो मिल जाए जीवन में ऐसे
जैसे गुंबद को छूता आकाश हो
अतीत की विस्मृतियों को भूल
उत्कर्ष की परिभाषा रचे ऐसे
जैसे मन्दिर ने छलकाया जग में
प्रीत भरा अमृत कलश हो

आरती झा
दिल्ली
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4 वर्ष पहले
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