नए साल का नया संकल्प
मन हो मन्दिर प्रांगण सा
गरल ना हो राग द्वेष का
भक्ति की बहती बयार हो
गूँजायमान रहे हर दिशा
चहचहाहट हो चिड़ियों सी
चेहरे पर मुस्कान हो ऐसी
प्रांगण में लहलहाते वृक्ष जैसे
जीवन में रंगों की बरसात ऐसी
जैसे बिछी हर ओर रंगोली हो
हृदय हो उमंग से सराबोर ऐसे
जैसे प्रांगण में झाँक रहा सूरज हो
नर नारी ऊँच नीच से दूर मानव
दीपमाला सजा हर आँगन हो
निकले वाणी, मधुर हो ऐसी
जैसे झंकृत मन्दिर की घंटी हो
मानवता में भरे उजास ऐसी
मंगलमय प्रभात मंदिर का हो
स्वप्न पाश में जकड़ी अभिलाषाएं
मुक्त हो मिल जाए जीवन में ऐसे
जैसे गुंबद को छूता आकाश हो
अतीत की विस्मृतियों को भूल
उत्कर्ष की परिभाषा रचे ऐसे
जैसे मन्दिर ने छलकाया जग में
प्रीत भरा अमृत कलश हो
आरती झा
दिल्ली
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