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सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी

Arjun Prabhat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी!
        
                                                    
                            
©® अर्जुन प्रसाद सिंह" प्रभात"
क्षणभंगुर संसार, नहीं इतराना जी ।
सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी।।

झूठा धन वैभव, ये झूठी माया है
नश्वर यह जीवों की सुंदर काया है
जो भी आया उसको जाना होता है
जो हंसता है उसको रोना होता है
क्या झूठी माया से नेह लगाना जी ।
सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी।।

जिस पर करते गर्व न वह रह पाएगा
धन वैभव यश साथ नहीं कुछ जायेगा
याद रखेगा कौन तुम्हारी कविता को
भूल जाएंगे लोग काव्य की सरिता को
आत्ममुग्धता में क्यों कर भरमाना जी ?
सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी।।

कितने आए, कितने गा कर चले गए
झूठी माया के द्वारा वे छले गए
धरती क्या आकाश बदलने वाले थे
ऐसे थे, इतिहास बदलने वाले थे
उनको भी दुनिया ने कब पहचाना जी?
सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी।।

तुम खोए रहते हो नित सम्मानों में
मस्त मगन हो इन नश्वर परिधानों में
यह दुनिया तो एक मुसाफिरखाना है
रहना नहीं यहां, फिर आगे जाना है
सफल वही सच को जिसने पहचाना जी।
सतत साधना पथ पर बढ़ते जाना जी।।
 
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