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मन की सूनी राहें

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कब से देख रहे राहें
        
                                                    
                            
वो आएंगे दिल बहलेगा
बीते दिन बरसों बीते
वो ना आए
मन की सूनी राहें
आकुल व्याकुल हो तकते
तकते नहीं नैन
झपकना भूल गईं पलकें
मोह की धुंध से
काली रातें दिन भी कारे
कब से खड़े यहां
जीवन के दिन बीते
सपने सब चूर हुए सारे
बांकी चितवन उनकी
नेह सुधा के रस बरसे
मन उमग उठे
धड़कन दिल की
सांसें उखड़ी
विरह वेदना तरपाए
मन व्याकुल हो कर पंथ निहारे
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
एक दिन पहले
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