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मन की सूनी राहें

                
                                                         
                            कब से देख रहे राहें
                                                                 
                            
वो आएंगे दिल बहलेगा
बीते दिन बरसों बीते
वो ना आए
मन की सूनी राहें
आकुल व्याकुल हो तकते
तकते नहीं नैन
झपकना भूल गईं पलकें
मोह की धुंध से
काली रातें दिन भी कारे
कब से खड़े यहां
जीवन के दिन बीते
सपने सब चूर हुए सारे
बांकी चितवन उनकी
नेह सुधा के रस बरसे
मन उमग उठे
धड़कन दिल की
सांसें उखड़ी
विरह वेदना तरपाए
मन व्याकुल हो कर पंथ निहारे
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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23 घंटे पहले

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