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जिंदगी का बोझ

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इतना बेगैरत नहीं
        
                                                    
                            
तेरे टुकड़ों पर नहीं पलता
स्वाभिमान की खातिर ही
जीता है हर इंसान
जिसे तमीज़ न हो
तालिम भी हासिल न हो
क्या समझेगा भला गैरत की बात
दौर बदले बदलता रहा
इंसानियत छोड़ कर इंसान
कंक्रीट के इन जंगलों में
जंगली जीवों से भी ज्यादा
जंगली बन चुका है
छोड़ कर जीवों की हर पहचान
जीवित रह कर भी
निर्जीव बन चुका है इंसान
संवेदन हीन, तमाशबीन
शवों की तरह कंधों पर लिए
अपनी ही जिंदगी का बोझ
चलता जा रहा थके कदमों से
दर्द से छटपटाता कृत्रिम मुस्कान
कम नहीं होता इसका
मिथ्या अभिमान
बेगैरत नहीं पर गैरत भी नहीं
खोखले बंधनों में जकड़ा हुआ
बेबस नजर आता है हर इंसान
एक दिन पहले
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