इतना बेगैरत नहीं
तेरे टुकड़ों पर नहीं पलता
स्वाभिमान की खातिर ही
जीता है हर इंसान
जिसे तमीज़ न हो
तालिम भी हासिल न हो
क्या समझेगा भला गैरत की बात
दौर बदले बदलता रहा
इंसानियत छोड़ कर इंसान
कंक्रीट के इन जंगलों में
जंगली जीवों से भी ज्यादा
जंगली बन चुका है
छोड़ कर जीवों की हर पहचान
जीवित रह कर भी
निर्जीव बन चुका है इंसान
संवेदन हीन, तमाशबीन
शवों की तरह कंधों पर लिए
अपनी ही जिंदगी का बोझ
चलता जा रहा थके कदमों से
दर्द से छटपटाता कृत्रिम मुस्कान
कम नहीं होता इसका
मिथ्या अभिमान
बेगैरत नहीं पर गैरत भी नहीं
खोखले बंधनों में जकड़ा हुआ
बेबस नजर आता है हर इंसान