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तुम, मैं और फ़साने

Aparajit Nandi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वादियों से निकलकर जैसे कोई जिद्दी नदी बहती है,
        
                                                    
                            
वैसे ही जैसे तुम्हारी अनोखी कहानी कह रही हो,
कभी राह में पत्थर आए तो हम दोनों टकराकर शोर मचाते हैं,
कभी मदमस्त लहरों से एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं।
लड़ाई हमारी उस उफनती हुई नदी की धारा जैसी है,
जो किनारों को भिगोती तो है, पर उनका साथ नही छोड़ती।
हमारे बीच के सुकून का एक शांत तालाब सा डेरा है,
जहाँ प्यार का गहरा और निर्मल पानी का चारों तरफ घेरा है।
उस तालाब के किनारे जो हँसी-ठिठोली के झरने फूटते हैं,
वे हमारे हर एक रूठे हुए पल को हँसते-हँसते लूटते हैं।
तुम्हारी हँसी जब कलकल करती हुई इन वादियों में गूँजती है,
तो प्रकृति का हर एक कोना खुशी से झूम उठता है, प्रिये!

मौसम कोई भी हो, धूप हो या सावन की फुहार हो,
तुम्हारे होने से ही इस जीवन में बहार है।
दुःख के पतझड़ में जब पत्ते सारे बिखर जाते हैं,
तब तुम्हारी प्रेम के बादल चुपचाप मुझे भिगो जाते हैं।
सुख की हरी-भरी वादियों में संग मिलकर चलना है,
इस प्रकृति की गोद में हमें उम्र भर पलना है।
पहाड़, नदी, झरने और तालाब यह सब तो बस बहाने हैं,
असल में तो इन सारी प्राकृतिक छटाओं में हमारे अपने ही फसाने हैं!
-अरविंद
एक घंटा पहले
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