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इज्ज़त

Anurag Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इज्ज़त,
        
                                                    
                            

न पैसों से खरीदी जा सकती,

और न ही उधार ली जा सकती है ,

इज्ज़त,

न किसी के बदले मिलती,

और न ही किसी के बदलने से मिलती है,

ये तो देने और लेने पर निर्भर करता है ,

कि कौन इसे,

सम्मान से दे रहा है,

और कौन इसे,

सम्मान से ले रहा है,

उम्र सारी गुजर जाती है इसे कमाने में ,

पर इक पल भी नहीं लगता,

इसे गंवाने में ,

पैसे कमाने के तो हजार तरीके हैं ,

पर इज़्जत,

इज्ज़त से ही कमाई जाती है ,

होगी बहुत,

कुछ लोगों के पास काली कमाई,

पर इज़्जत की कमाई की बात ही कुछ और है ,

कमजोर होती है वह अटारी,

जो बेईमानी की ईंटों से जोड़ी जाती है ,

ईमानदारी से बनी झोपड़ी भी,

अक्सर मजबूत होती है,

इज्ज़त आबरू है गहना है,

इज्ज़त बेटी है बहना है ,

इज्ज़त भगवान की पूजा है अर्चना है ,

शंख का नाद है मंदिर का प्रसाद है ,

इज्ज़त हर रूप में है,

कुरूप में है स्वरूप में है,

बेरूप में है हवन की धूप में है,

इज्ज़त,

चाय की प्याली में है,

पूजा की थाली में है,

होंठो की लाली में है,

और प्यार भरी गाली में है,

इज्ज़त,

बच्चों की मुस्कराहट में है,

चिड़ियों की चहचहाट में है ,

और किसी के आने की आहट में है,

इज्ज़त,

आँखों के नूर में है,

दिल के सुरूर में है ,

और जी हुज़ूर में है ,

इज्ज़त ,

इस दुनिया में सर्वव्याप्त है ,

पर ये खुशनसीबों को ही प्राप्त है,

और जिसे न मिलती ये किसी भी ओर से ,

तो ये छीनने की कोशिश करते हैं कमज़ोर से ,

और जिनमें,

इंसानियत की फितरत छूट जाती है,

तब उनमें,

हैवानियत की फितरत समा जाती है,

फिर नज़र और नियत बुरी हो जाती है,

और बेख़ौफ़ दरिंदगी शुरू हो जाती है,

उस भयावह मंज़र को देख,

हमारी रूह कांप जाती है ,

जिनकी आत्मा मर चुकी हो,

वो क्या खुदा से डरेंगे,

जो इंसान और इंसानियत न समझे,

वो खूंखार भेड़िये हर हद पार करेंगे,

और मासूम रिश्तों की बुनियाद को तार-तार करेंगे ,

जिस बगिया के फूल से बहार आती है,

उस बगिया को ही उजाड़ दिया जाता है,

और जिस दिल में,

अरमानों की सेज सजी रहती है,

उस दिल में ही ,

खंजर उतार दिया जाता है,

ये सब देखकर,

क्या यूँ ही हम चुप बैठेंगे,

होंठो को सीकर,

क्या बेख़ौफ़ हम जी सकेंगे,

अगर ऐसे ही चलता रहा हैवानियत का खेल,

तो पता नहीं अगली उधारी किसकी हो,

उस हैवान के चंगुल में फंसने की ,

पता नहीं अगली पारी किसकी हो,

पता नहीं अगली पारी किसकी हो।



हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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