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एक नालायक बेटा

ANURAG YADAV

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समेटनी थी रसोई पर वो हमे सुलाती थी,
        
                                                    
                            
हम से पहले उठ क्र अम्मा हमको रोज जगाती थी,
चन्दन का टीका दही की मिठास
भावनाओ की गठरी और दुआओ का लिबास
नित नए सपने बनाता था बनाता था मिटाता था,
अम्मा को सुनाता था सुनाता था रिझाता था

बिखरे है अब गलियारों में कुछ टुकड़े,
उम्मीदों के ,कुछ सपनो के कुछ अपनों के,

क्षितिज शून्य जा जीवन अपना, अब उल्लाषाओं से अब बैर हुआ,
रत्ती भर गुलाब सुखो का देने में,
विश्व युद्ध के गलाकाट में तेरा बेटा ढेर हुआ
शीश महल के सपनो में मिट्ठी का घरोंदा टूट गया
क्षमा याचना करता अम्मा, स्वर्ण भविष्य की दौड़ में तेरा नालायक बेटा छूट गया
अम्मा तेरा नालायक बेटा छूट गया...

अनुराग यादव अंशु

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