विज्ञापन

खुद की कहानी।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह घर से निकली तो गली के नुक्कड़ तक जाते-जाते,
        
                                                    
                            
जाने कितने लोगों की कहानी में शामिल हो गई…

“अरे, अपना ध्यान रखा करो,
क्या कोई परेशानी है?
खाना ठीक से नहीं खातीं
या बीमार चल रही हो?”

“रात को मोबाइल कम चलाया करो,
आँखों के नीचे काली लकीरें हो गई हैं।”

“इतना क्यों मुस्कुरा रही हो?
कोई बात है,
जो हमसे छुपा रही हो?”

“अरे, तुम तो वही हो ना,
मकान नंबर ग्यारह में रहती हो?
तो आगे जीवन के बारे में
क्या सोचा है?”

वह हर सवाल पर मुस्कुरा देती थी,
मौन होकर वहाँ से निकल जाती थी।

जैसे घर पर चाय उसका इंतज़ार कर रही हो,
और वह उस चाय का यह छोटा-सा वक़्त
किसी के साथ बाँटना नहीं चाहती हो।

उसका घर भी काफ़ी खुला था,
बिल्कुल उसके विचारों की तरह।

बड़ा दरवाज़ा,
बड़ा आँगन
और उसके ऊपर खुला आसमान।

आँगन के एक कोने में बड़ा-सा झूला था,
जहाँ बैठकर
वह अपने जीवन के सपने देखा करती थी।

इस घर में
दस साल पुराने कपड़ों पर भी
कोई सवाल नहीं होता था।

दीवारों की मरम्मत
मन होने पर होती थी,
और न हो तो
दीवारों को भी रहने दिया जाता था।

किचन से वही पुराना टी-सेट
बार-बार निकलता था,

एक ही रंग की चादर
कई रंग-रूप में खरीदी जाती थी।

मेज़ पर रखी एक किताब,
जो बे-वक़्त
कभी भी खुल जाती थी।

उसी किताब के बीचों-बीच
एक मुरझाया हुआ फूल रखा था,
जो जाने कितने बरसों बाद भी
वहीं साँस ले रहा था।

उसकी एक डायरी भी थी,
जिसके पन्नों पर
उसने अपने जीवन की कविताएँ लिखी थीं—
कुछ ऐसे शब्द,
जिन्हें पढ़कर
वह हर बार
थोड़ी और मज़बूत हो जाती थी।

अब जब भी वह
गली में निकलती,
अपनी पसंद की पायल पहनकर निकलती।

फिर वही सवाल
उसके रास्ते में आकर खड़े हो जाते,
मगर अब वह
घर लौटने की जल्दी नहीं करती थी।

पूछे गए सवालों के जवाब में
वह अब भी कुछ नहीं कहती थी।

बस उसके माथे की बिंदिया,
कानों में झूलते झुमके
और पायल की छनक
उसकी ओर से
बहुत कुछ कह जाती थी।

अब उसके हाथ में
उसकी अपनी घड़ी थी,
जो किसी और का समय नहीं,
उसका समय बताती थी।

“अरे, कभी चाय पर आओ,
बैठकर बात करते हैं।”

“तुम्हारा नाम रूपा है ना?”

“एक फोटो हो जाए
तुम्हारे साथ…”

“अगला क्या लिख रही हो?
हमें भी सुनाओ।”

अब वह गली से निकलकर
खुली सड़क पर थी।

अनजाने चेहरों के बीच
अब उसका नाम स्पष्ट था।

अब उसका मकान नंबर भी
थोड़ा बदल गया था।

पर यह लड़ाई
किसी सवाल-जवाब की नहीं थी,
मकान नंबर बदलने की भी नहीं।

यह तो
अपनी ही कहानी को
आगे बढ़ाने की थी—

अपनी शर्तों पर,
अपने समय पर,
अपने नाम के साथ।

वह फिर उसी रास्ते से गुज़री,
जहाँ कभी लोग
उसके बारे में बातें किया करते थे।

इस बार भी किसी ने पूछा—

“कहाँ जा रही हो?”

वह रुकी,
मुस्कुराई
और अपनी पायल की आवाज़ के साथ
आगे बढ़ गई।

क्योंकि अब उसे
हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं था।

उसे बस
अपनी कहानी लिखनी थी।

और इस बार
उस कहानी में
वह किसी की चर्चा नहीं,

खुद अपनी कहानी की नायिका थी।
7 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Pankaj Sharma

1271 कविताएं

View Profile