आज पहले से ही
दरवाज़ा खुला हुआ था,
सामानों की अदला-बदली चल रही थी।
हल्की-हल्की धूप
दरवाज़े से
सफ़ेद फ़र्श पर पड़ रही थी।
वही दरवाज़ा
जो हल्के भूरे रंग का था,
उसी दरवाज़े के सामने
एक बड़ा-सा काला-सुनहरा गेट था,
जो बाहर की तरफ़ खुलता था।
सड़क किनारे
जो एक घर था।
कई बरस बाद
उस गेट में आहट हुई,
उस घर का एक सामान
बाहर धकेला गया था।
अब अपने आप
या जानबूझकर—
कहना मुश्किल है।
बाहर गाड़ियों का
बहुत शोरगुल था,
लगा एक-आध को तो
वह निगल जाएगी।
सामान बचते-बचाते
अपनी जगह बना रहा था।
पहली बार
कई रंगों का
एक साथ सामना हुआ।
वह रंग
जो अभी तक
सिर्फ़ भूरे, पीले और काले थे।
अब दाएँ-बाएँ,
ऊपर-नीचे
सब जगह से
आवाज़ आ रही थी।
अब सामान को
अपना और सामान
मिल गया था।
पर वह जा कहाँ रहा था,
क्या उसे कहीं का पता था?
क्या वह पैदल जाएगा,
या किसी सवारी का इंतज़ार करेगा—
जो उसकी तरह
राह भटके होंगे?
अब आकाश भी
उसे छाया दे रहा था।
सड़क उसे
अपनी बातों में उलझा रहा था—
“पहली बार है तुम्हारा,
या पहले भी आए हो?”
अब पेड़ों की लंबाई देखकर
उसे अपने छोटे होने का
पता चला।
चला,
पर वो कहाँ चला?
अब भी यह सवाल
राह के मन में था।
राह उसका नया साथी था।
अब सफ़र में
दो लोग थे।
बड़ी-बड़ी इमारतें देखकर
एक बार तो
उसका माथा ठनका।
जैसे वह किसी
भूलभुलैया में आ गया हो,
बिना पते के।
जब उसने यहाँ-वहाँ
नज़र दौड़ाई,
सब अपनी राह पर
निशान छोड़ रहे थे।
छोटे-बड़े,
आड़े-टेढ़े,
अजीबो-ग़रीब—
जिनका कोई आकार नहीं था।
वो थोड़ी देर वहीं रुका,
कुछ समझने को हुआ।
अब यह उलझन
बढ़ती जा रही थी।
सड़क, राह—
जो अब धुँधली हो रही थी।
तभी उसने
अपने तन से वस्त्र निकाले,
अपने आसपास को
साफ़ करना शुरू किया।
अब उसके इस कार्य को देखकर
आसपास के लोग भी
उससे जुड़ने लगे।
अब वस्त्र के साथ-साथ
पानी और झाड़ू भी था,
और रास्ता
पहले से साफ़ था।
तभी उधर
एक गाड़ी आई,
जो कुछ दूर तक
भटके हुए को लेकर जा रही थी।
वो सब उसमें बैठ गए।
क्या उस गाड़ी वाले को
पता था
कि उन्हें कहाँ जाना है?