आज फिर से कुछ सामान
अस्त-व्यस्त है,
कमरे में सब वैसा ही है।
आज कई महीनों बाद
सामान को छेड़ा जा रहा है।
भारी-भरकम सामान को
हिलाना इतना आसान नहीं।
आज पीली चादर को
नीली चादर से बदला गया है।
पर्दों को भी
थोड़ा व्यवस्थित तरीके से
सजाया गया है।
आज कोई त्योहार तो नहीं,
फिर यह तैयारी क्यों?
सन् सत्तासी से
कुछ तस्वीरें लगी हैं इस दीवार पर,
उनके रंग भी
अब फीके पड़ गए हैं।
निकालने का मन तो नहीं कर रहा,
पर थोड़ा बदलाव
तो ज़रूरी है।
कुछ पुरानी तस्वीरें भी
मुख-दर्शन के लिए
आज कई बरसों बाद निकली हैं।
अरे! देखो तो ज़रा,
आज किचन में
कुछ नया बन रहा है।
किताबों को भी
उनकी धूल से हिला-हिलाकर
जगाया जा रहा है।
कुछ जगह
पुराने ज़ख्मों के निशान
सफ़ेदी की परतों में से
फिर निकल रहे हैं।
उन्हें शायद
किसी डॉक्टर की ज़रूरत है।
सामान को खिसकाने में
पीछे से
मन की परतों की मैल भी
निकल रही है।
अब उसको भी
साफ़ कपड़े से
नहलाया-धुलाया जाएगा।
फ़र्श पर
वही लाल कालीन
बिछी हुई है।
सामने का दरवाज़ा खोलते ही
हल्की-हल्की धूप
अपने नन्हे-नन्हे कदमों से
फ़र्श पर बिखर रही है।
फिर से वही सवाल आया है—
आज कोई त्योहार तो नहीं?
माँ चिल्लाती हैं,
पिताजी शांत हो जाते हैं।
इसका मतलब
यह कल्पना नहीं,
हक़ीक़त है।
आज इस कमरे को
थोड़ा पहचानना मुश्किल है।
तभी दरवाज़े पर
एक आवाज़ होती है,
जैसे कोई बुला रहा हो।
दरवाज़े पर
एक नन्ही बच्ची खड़ी होती है।
तो क्या
इसके लिए इतनी तैयारी हो रही थी?
नहीं,
यह भी नहीं है।
वह तो बस खेलने के लिए आती है
और चली जाती है।
आज एक रहस्य-सा
बना हुआ है घर में।
अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी
बड़ी उत्सुकता से पूछते हैं।
ऐसा कुछ है
जो हमें नहीं पता।
शायद
हर सवाल का जवाब देना
इतना ज़रूरी भी नहीं।
आज मेज़ पर
नए बर्तन रखे हैं,
जिनकी चिंता होती थी—
कहीं टूट न जाएँ।
नए फूल
और इत्र से
कमरे को महका दिया गया है।
फ़र्श पर अब
अपना ही अक्स
दिखने लगा है।
इतनी तैयारी के बाद भी
अब तक पता नहीं चला—
आख़िर कौन आ रहा है?
अब सुबह का सूरज
हल्का-हल्का ढलने लगा है।
बाहर तेज़ हवाएँ चल रही हैं,
जैसे मौसम कुछ ख़राब हो।
अब हल्का-सा
मद्धम गाना भी बजने लगा है।
एक तरफ़ गैस पर
चाय चढ़ाई जाती है,
दूसरी तरफ़
पकौड़े तले जा रहे हैं।
अब लगता है
समय क़रीब आ रहा है।
ट्रे में सब सामान सजाकर
टेबल पर रख दिया जाता है।
तब सबको आवाज़ लगाई जाती है—
सब हैं,
वह तो है ही नहीं।
हम चार,
बहुत पुरानी-पुरानी
गुफ़्तगू में लगे हैं।
अब पर्दा भी
ठीक से बंद कर दिया जाता है।
टेबल के बगल में
एक नोट रखा हुआ था—
“Welcome to Sweet Home.”
पड़ोसी अब भी
इंतज़ार कर रहे हैं,
पर यह शाम तो ढल गई।
सब अपने-अपने घरों में
चले जाते हैं।
अगले दिन
वही सवाल
वहीं रुक जाते हैं।