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वो शाम की चाय का इंतज़ार कर रहे हैं।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज दीवारों में
        
                                                    
                            
अलग-अलग आकृतियाँ दिख रही थीं,
शायद वे कुछ कहना चाह रही हों।

कुर्सियों के कवर में से भी
सिलाई निकल गई थी।

कुछ किताबें
ज़मीन पर बिखरी हुई थीं,
जिनके अक्षर
थोड़े मिट गए थे।

खिड़कियों के पास से
झाँकते हुए
कुछ जालीदार निशान थे।

जब भी घर में
कुछ बदलने की बात आती,
मम्मी हमेशा कहतीं—

“हम भी तो बूढ़े हो गए हैं।”

हमें भी सामानों की तरह
निकाल दो,
ऐसा क्या है
जो वह सहेजकर रखना चाहती हैं?

हमारे बचपन के बर्तन,
या फिर उनके ज़माने की
कुछ चीज़ें।

कितने कपड़ों को तो
रफ़ू करवाकर रख लिया है,
अब न जाने
किसकी बारी आएगी।

घर में नए बर्तन भी
मेहमानों के लिए निकलते हैं।

घर के लोगों का क्या,
वह तो चलते हैं।

चलने से याद आया—
कुछ लोग
सामानों की तरह चले गए।

कुछ तो बदला है—
नई चादर,
नए पर्दे।

जितनी जगह खाली करो,
उतनी ही भरती जाती है।

कितनी बार तो लगता है,
जैसे स्टेशन पर
रेल में रोज़ यात्री बदलते हैं।

वैसे ही यहाँ भी
कुछ हो रहा है।

अब तो सामने वाले घर में भी
पुराने वाले लोग आ गए हैं।

कल ही अपनी पुरानी तस्वीरें देखीं—
वो रिबन वाली चोटी,
वो छोटी-छोटी फ्रॉक।

अब देखो,
हर छह महीने में
सूट बदलने पड़ते हैं।

अब तो घर में
जितने लोग नहीं दिखते,
उतनी ऐनकें दिखती हैं।

अब तो दवाइयों के खर्चे भी
बढ़ गए हैं,
लगता है दीवारों को भी
दवाइयाँ देनी पड़ेंगी।

कुछ पौधे हैं बगीचे में,
जिनको दीमक लग गई है।

माली कह रहा था—
पूरी मिट्टी बदलनी पड़ेगी।

अब घर का पता पूछते समय
लोगों को नंबर से ज़्यादा
उसके आसपास की
निशानियाँ याद रहती हैं।

घर में लोग इतने बढ़ रहे हैं
कि घर का आकार
छोटा पड़ रहा है।

अब तो घर में
हिस्से बाँटने की भी
बात हो रही थी।

पता नहीं
हमें क्या मिलेगा।

वह खुला आँगन,
वह सफ़ेद झूला—
किसके पास जाएगा?

थोड़ा लड़-झगड़ने के बाद
हमें पुरानी किताबें
और साज-सजावट का
थोड़ा सामान मिला—
जो पहले से ही
थोड़ा फटा हुआ था।

अब उसकी आधी उम्र बीत गई,
कितना घिस-घिसकर चलेगा।

मम्मी अब भी
पुराने सामान को
न बदलने की बात पर अड़ी हैं।

पापा शांत हैं,
वो शाम की चाय का इंतज़ार कर रहे हैं।

वो चाय,
जो वो खुद बनाएँगे।

उन्हें किसी और
का
बदलाव पसंद नहीं।
एक घंटा पहले
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