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और झूले पर बैठी लड़की को भी

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज चाँद
        
                                                    
                            
अपने आधे स्वरूप में था।

वह खिड़की से
थोड़ा-सा निकला ही था
कि बादलों ने
उसे घेर लिया।

मैं यह सब
अपने उसी झूले पर बैठकर
देख रही थी।

वही सफ़ेद झूला,
जिस पर बैठकर
मैंने न जाने कितनी बार
चाँद से बातें की थीं।

आज भी
मैंने उससे पूछा—

इतना दूर क्यों रहते हो?

कभी पूरा निकल आते हो,
कभी बादलों के पीछे
छिप जाते हो।

क्या तुम भी
किसी से शर्माते हो?

चाँद शायद
मेरी बात सुनकर
थोड़ा मुस्कुराया था।

फिर बादलों के पीछे से
थोड़ा-सा चेहरा निकालकर
मुझे देखने लगा।

मैंने कहा—

तुम्हें पता है,
मैं तुम्हारे पास आना चाहती हूँ।

लेकिन न कोई ट्रेन है,
न कोई जहाज़,
न ही कोई ऐसा रास्ता
जो तुम्हारे घर तक जाता हो।

वह कुछ नहीं बोला।

बस
उसी तरह
मुझे देखता रहा।

फिर जाने कब
बादल हटे
और चाँद थोड़ा और बाहर आया।

मैं भी
उसी सफ़ेद झूले पर
बैठी रही।

वही सफ़ेद झूला,
वही सफ़ेद चाँद।

दोनों के बीच
एक खिड़की थी
और बहुत सारी बातें।

चाँद अब आधे से
थोड़ा मोटा हो गया था,
शायद उसकी माँ
अच्छा खाना बना रही थी।

अब वह उस टेढ़े घर के
सामने वाली छत पर था।

आधा खिड़की के उस पार
और आधा दरवाज़े के बाहर।

सफ़ेद-नीला दरवाज़ा
और उसी रंग की खिड़की।

आसपास उसके
कुछ दोस्त घूम रहे थे।

हाथ खोलकर,
अपनी ही मस्ती में,
वह अभी थोड़ी देर में
तारों की पार्टी में जाने वाला था।

उसकी माँ शायद
उसके कपड़े ढूँढ रही थी,
जो उसे पहनाने हैं।

उसके घर के नीचे
कई घर थे—
पीले, नारंगी और हरे,
और भी न जाने कितने रंगों के।

चाँद अब व्यस्त था—
दोस्तों की आवाज़,
शाम के उत्सव की तैयारी।

चाँद के घर के भीतर भी
रोशनी जल चुकी थी।

वो घर
जिसका पता
बहुत ही कम लोगों को था।

अब नीचे सड़क पर भी
बगल वाली लैंप पोस्ट
जल गई थी।

जिसके सामने
वो सफ़ेद झूला था,
पर इस समय
वो खाली था।

शायद उस पर बैठी हुई
लड़की को भी
इस उत्सव का पता था।

माँ जद्दोजहद करती है
चाँद को कपड़े पहनाने में,
कान के बगल में
काला टीका भी लगाती है।

चाँद को भी
नज़र लग जाती है।

धीरे-धीरे
वह समय आता है,
जब भागने की तैयारी होती है।

शाम उसी तरह
ढलती रहती है।

और चाँद,
अपनी ही दुनिया में व्यस्त,
तारों की पार्टी में चला जाता है।

आज
उसे छेड़ने वाला
कोई नहीं था।

और झूले पर बैठी लड़की को भी
चाँद से बात करने की
कोई जल्दी नहीं थी।
एक घंटा पहले
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