छू लो अवनी,छू लो अंबर
भर कर साहस अपने अंदर
भर लो साहस का समंदर
आज अभी अपने अंदर
धरा को मुठ्ठी में बंद कर लो
खुद को कविता का छंद कर लो
खुद को तुम स्वच्छंद कर लो
भर लो,भर लो,प्यार अपने अंदर भर लो।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'