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भारत मां के चरणों में

Ankit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब कभी विदेश नहीं मैं जाऊंगा
        
                                                    
                            
स्वदेश में ही खूब श्रम कर कमाऊंगा
कभी कभी भले भूखे सो जाऊंगा
रुखा सूखा जो मिले मैं खाऊंगा
भले टूटी फूटी झोंपड़ी में रह लूंगा
भले बड़ों का डांट फटकार सह लूंगा
भले कपड़े कुछ कम पहन लूंगा
गया था नेपाल में
रहा किस हाल में
कैसे किसी को सारी बातें बताऊं मैं?
सुंदर स्वदेश छोड़ क्यों कहीं जाऊं मैं?
लोग विदेश में चिढ़ाते हैं
लोग विदेश में धकियाते हैं
लोग विदेश में चिचियाते हैं
लोग विदेश में भेदभाव दिखाते हैं
अब और धक्का नहीं मैं खाऊंगा
अब अपने गांव शहर में घर बसाऊंगा
अब अपनी भोजपुरी भाषा में बतियाऊंगा
अब अपनी हिंदी में मैं बतियाऊंगा
अब अपनी प्यारी संस्कृति को बढ़ाऊंगा
अब अपने खेतों में हीरा सोना उपजाऊंगा
अब अपनी भारत मां के आंचल में दुलार पाऊंगा
अब अपने तिरंगे के नीचे राष्ट्र गान गाऊंगा
अब अपनी माटी में प्यार की फसल उगाऊंगा
अब गंगा मईया में रोज सुबह-शाम डूबकी लगाऊंगा
अब अपनी प्यारी भारत मां
अब अपनी प्यारी धरती मां
के चरणों में नित शीष झुकाऊंगा
अब कभी विदेश नहीं मैं जाऊंगा।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
5 घंटे पहले
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