अब कभी विदेश नहीं मैं जाऊंगा
स्वदेश में ही खूब श्रम कर कमाऊंगा
कभी कभी भले भूखे सो जाऊंगा
रुखा सूखा जो मिले मैं खाऊंगा
भले टूटी फूटी झोंपड़ी में रह लूंगा
भले बड़ों का डांट फटकार सह लूंगा
भले कपड़े कुछ कम पहन लूंगा
गया था नेपाल में
रहा किस हाल में
कैसे किसी को सारी बातें बताऊं मैं?
सुंदर स्वदेश छोड़ क्यों कहीं जाऊं मैं?
लोग विदेश में चिढ़ाते हैं
लोग विदेश में धकियाते हैं
लोग विदेश में चिचियाते हैं
लोग विदेश में भेदभाव दिखाते हैं
अब और धक्का नहीं मैं खाऊंगा
अब अपने गांव शहर में घर बसाऊंगा
अब अपनी भोजपुरी भाषा में बतियाऊंगा
अब अपनी हिंदी में मैं बतियाऊंगा
अब अपनी प्यारी संस्कृति को बढ़ाऊंगा
अब अपने खेतों में हीरा सोना उपजाऊंगा
अब अपनी भारत मां के आंचल में दुलार पाऊंगा
अब अपने तिरंगे के नीचे राष्ट्र गान गाऊंगा
अब अपनी माटी में प्यार की फसल उगाऊंगा
अब गंगा मईया में रोज सुबह-शाम डूबकी लगाऊंगा
अब अपनी प्यारी भारत मां
अब अपनी प्यारी धरती मां
के चरणों में नित शीष झुकाऊंगा
अब कभी विदेश नहीं मैं जाऊंगा।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'