दर्द कितने मिले कुछ खबर ही नहीं।
जैसे मुझ पर हुआ कुछ असर ही नही।
मैने दुनिया में देखे बहुत से मकां।
जिस को घर कह सकूं ऐसा घर ही नहीं।।
हाथ जिसका पकड़ कर चलूँ दूर तक।
मेरी क़िस्मत में वो हमसफ़र ही नही।
बात करता हो जो भी इधर की उधर।
मेरी नज़रों में वो मौतबर ही नही।
क्या बिगाड़ेगा अब ये ज़माना मेरा।
मेरी आँखो में अब कोई डर ही नही।
चाह उड़ने की दिल में तो है अंजलि,
जिस से मैं उड़ सकूं ऐसा पर ही नही।।
-अंजली श्रीवास्तव