कुछ पन्ने बंद किताब के
खुलने को बेताब रहते हैं,
पर वे खुल नहीं पाते।
एक-दूसरे के संग इस तरह जुड़ जाते हैं
कि पढ़े भी नहीं जाते और खुल भी नहीं पाते।
कुछ पन्ने किताब के इस तरह खुलते हैं
कि अपने होने से ही हट जाते हैं,
और गहरे रहस्य, दूर बहुत दूर,
मिट्टी में मिल जाते हैं।
कुछ पन्ने किताब के
खाली पन्ने ही रह जाते हैं।
मेरी तरह—
जब भी ख़ुद को बताना चाहती हूँ,
कहानी में
सिर्फ़ मैं ही रह जाती हूँ,
बिल्कुल अकेली…और खाली।
— अनीता “निधि”